Sunday, 23 November 2025

जड़ों की बात

 जड़ों में 

सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं 

वहां पहाड़ हैं 

दुखों के 

(एक बार एक कवि ने 

दुःख को चम्मच से नहीं पीने 

आकंठ डूबने के बारे में कहा )

यहाँ तो इन पहाड़ों के 

कालयात्री हैं 

जो 

अपने तजुर्बों में 

हँसते गाते हैं 

इन पहाड़ों में ही 

छुपी है 

जगमगाती संजीवनी 

जीवन की .

इन पहाड़ों की तलहटी में 

नदियाँ ही नहीं 

बल्कि 

सागर हैं 

इतने जहरीले 

रेंगते कीड़े हैं 

कि छूते ही 

आत्मा तक में ज़हर उतर जाय 

फन फैलाए डोलते 

विषधर हैं .

लेकिन ,

इन्हीं जड़ों में 

दुपट्टों , ओढ़नियों 

और हिजाबों में 

सँभालकर रखे गये सपने हैं 

सपनों की ज़िद है 

यहाँ 

बच्चों के सपनों में 

अभी भी रौशनी 

की गेंदों के साथ 

सफ़ेद दाढ़ीवाले बूढ़े 

आते हैं. 

जड़ों में 

निराशा है 

अवसाद है 

डाटा फ्री है 

लेकिन ,

इनसे रोज उबरने और 

उभरने की खिलखिलाहट है .

जुगनू हैं 

हरी हरी चमकीली घास है 

गीत हैं 

उम्मीदें हैं 

ज़िन्दगी है 

अब भी इंतज़ार है 

जड़ों को

मिट्टी के रंगों का.

भटकटैया: जड़ों की बात

भटकटैया: जड़ों की बात :  जड़ों में  सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं  वहां पहाड़ हैं  दुखों के  (एक बार एक कवि ने  दुःख को चम्मच से नहीं पीने  आकंठ डूबने...