भटकटैया
Monday, 29 December 2025
भटकटैया: जड़ों की बात
Sunday, 23 November 2025
जड़ों की बात
जड़ों में
सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं
वहां पहाड़ हैं
दुखों के
(एक बार एक कवि ने
दुःख को चम्मच से नहीं पीने
आकंठ डूबने के बारे में कहा )
यहाँ तो इन पहाड़ों के
कालयात्री हैं
जो
अपने तजुर्बों में
हँसते गाते हैं
इन पहाड़ों में ही
छुपी है
जगमगाती संजीवनी
जीवन की .
इन पहाड़ों की तलहटी में
नदियाँ ही नहीं
बल्कि
सागर हैं
इतने जहरीले
रेंगते कीड़े हैं
कि छूते ही
आत्मा तक में ज़हर उतर जाय
फन फैलाए डोलते
विषधर हैं .
लेकिन ,
इन्हीं जड़ों में
दुपट्टों , ओढ़नियों
और हिजाबों में
सँभालकर रखे गये सपने हैं
सपनों की ज़िद है
यहाँ
बच्चों के सपनों में
अभी भी रौशनी
की गेंदों के साथ
सफ़ेद दाढ़ीवाले बूढ़े
आते हैं.
जड़ों में
निराशा है
अवसाद है
डाटा फ्री है
लेकिन ,
इनसे रोज उबरने और
उभरने की खिलखिलाहट है .
जुगनू हैं
हरी हरी चमकीली घास है
गीत हैं
उम्मीदें हैं
ज़िन्दगी है
अब भी इंतज़ार है
जड़ों को
मिट्टी के रंगों का.
Friday, 20 December 2024
साहित्यिक सा कुछ नहीं है यहाँ लेकिन थोड़ी कुलबुलाहट है. थोड़ी विकलता है, रातों में अचानक नींद से उठ बैठने का बकाया है , छोटा मुंह छोटी-छोटी बातें कहने की जुर्रत है. बस इतना ही .
यहाँ आएंगी कुछ बातें जिन्हें हम कविता नहीं कहते, आप पर है आप क्या कहते हैं इन्हें ...
यहाँ बातों के कुछ ऐसे रंग भी आएँगे जो पता नहीं किस्से बन सके या नहीं ..लेकिन ... जिनमें भटकटैया दिख गया ...
भटकटैया: जड़ों की बात
भटकटैया: जड़ों की बात : जड़ों में सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं वहां पहाड़ हैं दुखों के (एक बार एक कवि ने दुःख को चम्मच से नहीं पीने आकंठ डूबने...
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जड़ों में सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं वहां पहाड़ हैं दुखों के (एक बार एक कवि ने दुःख को चम्मच से नहीं पीने आकंठ डूबने के बारे में कहा ) यहाँ...
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भटकटैया की बात आज पहले पोस्ट में इस शुरुआत के बारे में ही बात करते हैं . तो, यह भटकटैया ज़िन्दगी को उसके तमाम रूप,रस ,गंध, ज़िद ,ज़िन्दगीपन...
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