Friday, 20 December 2024

भटकटैया की बात 
 आज पहले पोस्ट में इस शुरुआत के बारे में ही बात करते हैं . तो, यह भटकटैया  ज़िन्दगी को उसके तमाम रूप,रस ,गंध, ज़िद ,ज़िन्दगीपन और विद्रूपताओं विसंगतियों सहित देखने की  एक छोटी सी कोशिश है. ज़िन्दगियों के उधड़ते सीवनों और पैबन्दों को सँभालती और वक़्त के थपेड़ों से उड़ते चीथड़ों को सहेजने में लगी रूहों के गीत ,किस्से और कहानियों को बटोरने का दुस्साहस है. नफरत की फैलती हुई विषबेल ने फल दिए हैं ज़रूर लेकिन कुछ रूहें ऐसी हैं जिन्होंने उन्हें चखा नहीं है . यह रूमानी बात नहीं है . ये पवित्र रूहें नहीं हैं .  ये जीवन के हर रंग में रंगी हैं . लेकिन, इनमें कॉमन क्या है ,इनमें कॉमन है एक भटकटैया . हर हाल में , किसी भी मिट्टी में , किसी भी मौसम में खिलता ,झूमता उपजता भटकटैया . और ज़िन्दगी से उपजा ज़िन्दगी की बेहतरी की उम्मीद लिए भटकटैया  . 

साहित्यिक सा कुछ नहीं है यहाँ लेकिन थोड़ी  कुलबुलाहट है. थोड़ी  विकलता है,  रातों में अचानक नींद से उठ बैठने का बकाया है , छोटा मुंह छोटी-छोटी बातें कहने की जुर्रत है.  बस इतना ही .

यहाँ  आएंगी कुछ बातें  जिन्हें हम कविता नहीं कहते,  आप पर है आप क्या कहते हैं इन्हें ...

यहाँ बातों के कुछ ऐसे रंग भी आएँगे जो पता नहीं  किस्से बन सके या नहीं ..लेकिन ... जिनमें भटकटैया दिख गया ...


भटकटैया: जड़ों की बात

भटकटैया: जड़ों की बात :  जड़ों में  सिर्फ़ जड़ें ही नहीं हैं  वहां पहाड़ हैं  दुखों के  (एक बार एक कवि ने  दुःख को चम्मच से नहीं पीने  आकंठ डूबने...